घर मे पधारो म्हारा गजानन देवा...पूर्ण करजो काज !!

घर मे पधारो म्हारा गजानन देवा...पूर्ण करजो काज !!
अनीष व्यास 
स्वतंत्र पत्रकार
विघ्नहर्ता, प्रथमपूज्य, एकदन्त भगवान श्री गणेश को ऐसे कई नामों से जाना जाता है। किसी भी शुभ काम की शुरूआत करनी हो या फिर किसी विघ्न को दूर करने की प्रार्थना करनी हो, गजानन सबसे पहले याद आते हैं। कोई भी सिद्धि हो या साधना, विघ्नहर्ता गणेशजी के बिना सम्पूर्ण नहीं मानी जाती। भाद्रप्रद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेशजी का जन्मोत्सव गणेश चतुर्थी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश के रूप में विष्णु शिव-पार्वती के पुत्र के रूप में जन्मे थे। उनके जन्म पर सभी देव उन्हें आशाीर्वाद देने आए थे। विष्णु ने उन्हें ज्ञान का, ब्रह्मा ने यश और पूजन का, शिव ने उदारता, बुद्धि, शक्ति एवं आत्म संयम का आशीर्वाद दिया। लक्ष्मी ने कहा कि जहां गणेश रहेंगे, वहां मैं रहूंगी।’ सरस्वती ने वाणी, स्मृति एवं वक्तृत्व-शक्ति प्रदान की। सावित्री ने बुद्धि दी। त्रिदेवों ने गणेश को अग्रपूज्य, प्रथम देव एवं रिद्धि-सिद्धि प्रदाता का वर प्रदान किया। इसलिये वे सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्वदैशिक लोकप्रियता वाले देव हैं।
भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भगवान श्रीगणेश के अवतरण की तिथि माना गया है। यह तिथि सभी संकटों का नाश करने वाली है। इस तिथि को सर्व कामनाओं को प्रदान करने वाली माना जाता है। भगवान शिव द्वारा श्रीगणेश को पुन: जीवित करने की घटना इसी तिथि को हुई थी। इसलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है। 2 सितंबर से 12 सितंबर तक चलने वाले इस उत्सव में हरेक व्यक्ति भगवान गणपति की कृपा पाने का इच्छुक रहता है। किसी भी कार्य को यदि सही मुहूर्त पर सम्पन्न किया जाता है तो कार्य की सफलता सुख-शांति निश्चित हो जाती है।
भगवान श्रीगणेश बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता हैं। उनके जन्म का उत्सव दस दिनों तक उत्साह से मनाया जाता है और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होता है। माना जाता है कि भगवान श्रीगणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ, इसीलिए मध्याह्न के समय को श्रीगणेश की पूजा के लिए उपयुक्त माना जाता है। प्राचीन काल में बच्चों का विद्या अध्ययन इसी दिन से प्रारंभ होता था। इस दिन विधि-विधान से श्रीगणेश का पूजन करें। उन्हें वस्त्र अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में मोदक अर्पित करें। इस दिन चंद्रमा के दर्शन को निषिद्ध किया गया है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस रात्रि चंद्रमा को देखते हैं उन्हें मिथ्या कलंक भोगना होता है। कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण पर कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। ऋषि नारद के कहने पर भगवान श्रीकृष्ण ने गणेश चतुर्थी का व्रत किया और मिथ्या दोष से मुक्त हुए। चंद्रमा को अपनी सुंदरता पर अभिमान था। एक दिन श्रीगणेश को देख चन्द्रमा ने उनका उपहास कर दिया। इससे श्रीगणेश कुपित हो गए और श्राप दे दिया कि जो भी चंद्रमा को देखेगा उसे झूठा कलंक लगेगा। चंद्रमा अपनी कलाओं से रहित हो जाएगा। बाद में चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीगणेश ने चंद्रमा को उनकी कलाओं से युक्त कर दिया और केवल एक दिन के लिए उन्हें दर्शन किए जाने के अयोग्य रहने दिया।
प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश अपने मंगलकारी स्वरूप और रिद्धि-सिद्धि प्रदान करने के कारण जन-जन को प्रिय हैं। उनकी ख्याति केवल भारत में ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया, जापान, चीन समेत दुनिया के अनेक देशों में किसी किसी रूप में कल्याणकारी देवता के रूप में फैली हुई है। लगभग प्रत्येक हिंदू परिवार भगवान श्री गणेश से जुड़ी कथाओं, व्रत, त्योहार आदि से भलीभांति परिचित है, लेकिन फिर भी वेद-पुराणों में उनके बारे में अनेक ऐसी बातें बताई गई हैं जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। कई बातें तो ऐसी हैं जो शायद ही पहले किसी ने उनके बारे में सुनी हो।
विष्णु ने ही गणेश के रूप में जन्म लिया
विष्णु ने ही गणेश के रूप में जन्म लिया सुनने में यह बात बड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन एक पौराणिक कथा में इसका जिक्र है। उसके अनुसार पुत्र की प्राप्ति के लिए एक बार माता पार्वती ने पुण्यक व्रत रखा था। यह व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए किया जाता है। व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने मां पार्वती को दर्शन दिए और उनके पुत्र के रूप में जन्मने की घोषणा की। कहीं-कहीं इस कथा में विष्णु की जगह कृष्ण का वर्णन भी मिलता है। इस कहानी पर विश्वास करें तो भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण माता पार्वती के पुत्र हुए। 
गणेशजी और तुलसी ने एक-दूसरे को दिया श्राप 
गणेशजी और तुलसी ने एक-दूसरे को दिया श्राप यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी कि गणेशजी के श्राप से ही तुलसी एक पौधा बन गई। दरअसल इसकी कहानी ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलती है। कहा जाता है एक बार गणेशजी गंगा के किनारे ध्यान कर रहे थे। तभी वहां से एक खूबसूरत कन्या तुलसी देवी गुजरी। तुलसी को गणेशजी का स्वरूप भा गया और मोहित होकर उन्होंने गणेशजी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। तब गणेशजी ने तुलसी को कहा कि वे अपने जीवन में कभी भी विवाह नहीं करेंगे, यह सुनकर तुलसी क्रोधित हो गई और उन्होंने गणेशजी को श्राप दिया कि आपका यह प्रण कभी सफल नहीं होगा और आप एक नहीं, दो-दो स्त्रियों से शीघ्र ही विवाह करेंगे। तुलसी के इस तरह श्राप देने से गणेशजी भी क्रोधित हो गए और उन्होंने तुलसी को उसी क्षण हमेशा के लिए पौधा बनने का श्राप दे दिया। दोनों का एक-दूसरे को दिया गया श्राप फलीभूत हुआ और गणेशजी का विवाह रिद्धि सिद्धि से हुआ और तुलसी पौधे के रूप में आज भी विद्यमान है।
10 दिन तक चलने वाला गणेश चतुर्थी उत्सव 2 सितंबर से शुरू होगा। गणेश चतुर्थी पर लोग अपने घरों में गणेश भगवान को विराजमान करते हैं और गणेश चतुर्थी के दिन उनका विसर्जन किया जाता है। लोक 11या  7 दिन के लिए घर में गणपति को विराजमान करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि बप्पा इन दिनों में अपने भक्तों के सभी दुख दूर करके ले जाते हैं। 
गणपति की प्रतिष्ठापना
गजानन को लेने जाएं तो नवीन वस्त्र धारण करें। इसके बाद हर्षोल्लास के साथ उनकी सवारी लाएं। घर में लाने के बाद चांदी की थाली में स्वास्तिक बनाकर उसमें गणपति को विराजमान करें। चांदी की थाली संभव हो पीतल या तांबे का प्रयोग करें।  घर में विराजमान करें तो मंगलगान करें, कीर्तन करें। लड्डू का भोग भी लगाएं। इसके बाद रोज सुबह -शाम उनकी आरती करें और मोदक का भोग लगाएं और अंतिम दिन विसर्जन करें।
ऐसा हो पूजा स्थल
आज आप इस समय अपने घर गणपति को विराजमान करें। कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। चार हल्दी की बंद लगाएं। एक मुट्ठी अक्षत रखें। इस पर छोटा बाजोट, चौकी या पटरा रखें। लाल, केसरिया या पीले वस्त्र को उस पर बिछाएं। रंगोली, फूल, आम के पत्ते और अन्य सामग्री से स्थान को सजाएं। तांबे का कलश पानी भर कर, आम के पत्ते और नारियल के साथ सजाएं। यह तैयारी गणेश उत्सव के पहले कर लें। 
गणेश चतुर्थी का महत्व
भविष्य पुराण के अनुसार शिवा, संज्ञा और सुधा यह तीन चतुर्थी होती है, जिसमें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संज्ञा कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इसमें स्नान और उपवास करने से 101 गुना फल प्राप्त होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। इसी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्यान्ह में भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इसी कारण यह तिथि महक नाम से भी जानी जाती है। इस दिन भगवान गणपति की पूजा, उपासना व्रत, कीर्तन और जागरण आदि करना चाहिए।
भगवान गणेश के जन्म की कथा
भगवान गणेश के जन्म के बारे में शिवपुराण में एक कथा है। कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती अपने शरीर पर हल्दी और उबटन लगाए हुई थीं। जब उन्होंने अपने शरीर से हल्दी और उबटन को हटाया तो उससे छोटा सा एक पुतला बनाया। फिर उन्होंने अपने तपोबल से उस पुतले में प्राण डाल दिए। इस तरह से बाल गणेश का जन्म हुआ। जन्म के पश्चात माता पार्वती स्नान करने चली गईं और बाल गणेश को द्वार पर बैठा दिया, साथ ही बोला कि किसी को अंदर आने देना। इसी बीच भगवान शिव वहां पहुंचे। वे अंदर आना चाहते थे, लेकिन बाल गणेश ने उनका रास्ता रोक लिया। भगवान शिव के बार-बार कहने पर भी उनको अंदर आने नहीं दिया। तब क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बाल गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। इसी बीच माता पार्वती वहां पहुंची। वह बाल गणेश की हालत देखकर रो पड़ी और भगवान शिव से बोलीं कि आपने ये क्या कर दिया। यह आपका पुत्र गणेश है। यह सुनकर शिव जी स्तब्ध रह गए। फिर पार्वती जी ने गणेश के जन्म की बात बताई। तब भगवान शिव ने एक हाथी का सिर बाल गणेश के धड़ पर लगाया और उसमें प्राण डाले। ऐसे बाल गणेश दोबारा जीवित हुए और वे गजानन कहलाए।
गणेश जी ही एक ऐसे देवता है जिनका नाम किसी भी पूजा या शुभ काम में सबसे पहले लिया जाता है। कहते हैं जो लोग गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणपति को अपने घर बुलाते हैं और पूरी श्रद्धा से गणेश जी का पूजन करते हैं उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं।गणेश जी को विनायक भी कहा जाता है। इसका मतलब होता है विशिष्ट नायक। गणेश जी के पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व होता है। बिना दूर्वा के इनकी पूजा अधूरी मानी जाती है।इसके साथ ही गणपति को मोदक भी प्रिय है। मोदक का मतलब होता है। मोद आनंद इसे गणेश जी को अर्पित करने से वह प्रसन्न होकर आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।गणेश जी का पूजन करने से लोगों की बुद्धि सही होती है। मन साफ होता है। लोग अपनी इच्छाओं को पूरी करने के लिए साफ मन से गणपति की आराधना करते हैं। जिससे बप्पा खुश होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। 2 सितंबर को प्रातः 8.35 बजे से रवियोग भी प्रारंभ हो जाएगा, जो स्थापना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
चौघडि़या के अनुसार स्थापना के मुहूर्त 
अमृत: प्रातः 6.10 से 7.44 बजे तक 
शुभ: प्रातः 9.18 से 10.52 बजे तक 
लाभ: दोप. 3.34 से सायं 5.08 बजे तक 
अमृत: सायं 5.08 से 6.42 बजे तक 
चर: सायं 6.42 से रात्रि 8.08 बजे तक 
लग्न के अनुसार स्थापना के मुहूर्त 
सिंह लग्न: प्रातः 5.03 से 7.11 बजे तक 
कन्या लग्न: प्रातः 7.11 से 9.16 बजे तक 
धनु लग्न: दोपहर 1.47 से 3.52 बजे तक 
कुंभ लग्न: सायं 5.40 से 7.08 बजे तक 
मेष लग्न: रात्रि 8.43 से 10.24 बजे तक 
अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12.01 से 12.51 बजे तक 

गणपति करेंगे सभी दुखों का नाश, राशि अनुसार लगाएं ये खास भोग
मेष राशि 
इस राशि के जातकों को गणेश चतुर्थी के दिन गणपति को छुहारे और लड्डू का भोग लगाना चाहिए।
वृष राशि
वृष राशि के लोगों को श्रीगणेश भगवान को नारियल या मिश्री से बने लड्डू का भोग लगाना चाहिए और इसे प्रसाद स्वरुप लोगों में वितरित करना चाहिए। 
मिथुन राशि 
गणेश चतुर्थी पर मिथुन राशि के जातकों को मूंग के लड्ड गणपति को भोग लगाना चाहिए। इससे गणपति की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
कर्क राशि 
इस राशि के जातकों को गणपति को मक्खन, खीर या लड्डू का भोग लगाकर गणेश चतुर्थी पर पूरे विधि विधान से भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। 
सिंह राशि 
गणेश चतुर्थी पर सिंह राशि के जातकों को भगवान गणेश को  गुड़ के मोदक एवं छुहारे का भोग लगाना चाहिए।    
कन्या राशि 
कन्या राशि के जातकों को गणपति महाराज को हरे फल या किशमिश का भोग लगाना चाहिए। 
तुला राशि 
इस राशि के लोगों को भगवान गणेश को लड्डू और केला अर्पित करना चाहिए। 
वृश्चिक राशि 
वृश्चिक राशि के लोगों को गणेश चतुर्थी पर गणपति को छुहारा और गुड़ के लड्डू प्रसाद स्वरुप चढ़ाना चाहिए। 
धनु राशि 
इस राशि के जातकों को गणपति को मोदक एवं केले का भोग लगाना चाहिए। 
मकर राशि 
गणेश चतुर्थी पर मकर राशि के जातकों को भगवान गणेश को तिल के लड्डू का भोग लगाना चाहिए। 
कुंभ राशि 
कुंभ राशि के जातकों को भगवान गणेश को गुड़ के लड्डू अर्पित करना चाहिए। 



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