गुरूब्रह्मा गुरुविष्णु गुरुदेर्वो महेश्वर...गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः !!

गुरूब्रह्मा गुरुविष्णु गुरुदेर्वो महेश्वर...गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः !!

अनीष व्यास 
स्वतंत्र पत्रकार
हमारे देश में प्राचीनकाल से ही गुरु-शिष्य परंपरा को सर्वोपरि माना गया है। वैसे भी कहा गया है कि शिक्षा विहीन मनुष्य अपूर्ण होता है। अब जाहिर है कि शिक्षा अगर इतनी अहम है तो इसे प्रदान करने वाला यानी शिक्षक कितना महत्वपूर्ण है। शिक्षक के कंधों पर समाज के भविष्य को संवारने, निखारने और उसे सदमार्ग पर ले जाने की जिम्मेदारी होती है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में तो शिक्षक को ईश्वर समान ही बताया गया है। 
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः। इसका अर्थ है गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश है। इसलिए मैं उनको प्रणाम करता हूं।
देश में हर साल 5 सितंबर को टीचर्स डे मनाया जाता है। इस मौके पर स्कूलों में रंगारंग प्रोग्राम होते हैं।आधुनिक समय में स्टूडेंट्स इस खास दिन अपने टीचर्स को संदेश भेजकर या गिफ्ट देकर विश करते हैं। इस दिन स्टूडेंट्स अपने-अपने तरीके से शिक्षकों के प्रति प्यार और सम्मान प्रकट करते हैं। स्टूडेंट्स शिक्षकों को गिफ्ट्स देते हैं।स्कूलों में शिक्षकों के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 
डॉ. राधाकृष्णन महान शिक्षाविद थे। उनका कहना था कि शिक्षा का मतलब सिर्फ जानकारी देना ही नहीं है। जानकारी का अपना महत्व है लेकिन बौद्धिक झुकाव और लोकतांत्रिक भावना का भी महत्व है, क्योंकि इन भावनाओं के साथ छात्र उत्तरदायी नागरिक बनते हैं। डॉ. राधाकृष्णन मानते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होगा, तब तक शिक्षा को मिशन का रूप नहीं मिल पाएगा। अपने जीवन में आदर्श शिक्षक रहे भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुतनी ग्राम में हुआ था। इनके पिता सर्वपल्ली वीरास्वामी राजस्व विभाग में काम करते थे। इनकी मां का नाम सीतम्मा था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा लूनर्थ मिशनरी स्कूल, तिरुपति और वेल्लूर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई की. 1903 में युवती सिवाकामू के साथ उनका विवाह हुआ।
इसलिए मनाते हैं टीचर्स डे
पांच सितंबर को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती भी आयोजित होती है। उन्हीं की याद में हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इसके पीछे की कहानी ये है कि एक बार उनके कुछ विद्यार्थी और दोस्तों ने उनके जन्मदिन को सेलिब्रेट करने का मन बनाया। इस पर डॉ सर्वपल्ली ने कहा कि मेरा जन्मदिन अलग से मनाने के बजाए अगर मेरा जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे गर्व महसूस होगा। राधाकृष्णन ने 12 साल की उम्र में ही बाइबिल और स्वामी विवेकानंद के दर्शन का अध्ययन कर लिया था। उन्होंने दर्शन शास्त्र से एम.. किया और 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में सहायक अध्यापक के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई। उन्होंने 40 वर्षों तक शिक्षक के रूप में काम किया। वह 1931 से 1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति रहे. इसके बाद 1936 से 1952 तक ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के पद पर रहे और 1939 से 1948 तक वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर आसीन रहे. उन्होंने भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन किया। साल 1952 में उन्हें भारत का प्रथम उपराष्ट्रपति बनाया गया और भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बनने से पहले 1953 से 1962 तक वह दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति थे। इसी बीच 1954 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 'भारत रत्न' की उपाधि से सम्मानित किया। डॉ. राधाकृष्णन को ब्रिटिश शासनकाल में 'सर' की उपाधि भी दी गई थी। इसके अलावा 1961 में इन्हें जर्मनी के पुस्तक प्रकाशन द्वारा 'विश्व शांति पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया था। कहा जाता है कि वे कई बार नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट हुए थे।
ये हैं वो महान शिक्षक, जो भारत ही नहीं दुनिया के लिए हैं मिसाल
डॉ. राधाकृष्णन ने 1962 में भारत के सर्वोच्च, राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। जानेमाने दार्शनिक बर्टेड रशेल ने उनके राष्ट्रपति बनने पर कहा था, 'भारतीय गणराज्य ने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति चुना, यह विश्व के दर्शनशास्त्र का सम्मान है। मैं उनके राष्ट्रपति बनने से बहुत खुश हूं। प्लेटो ने कहा था कि दार्शनिक को राजा और राजा को दार्शनिक होना चाहिए। डॉ. राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनाकर भारतीय गणराज्य ने प्लेटो को सच्ची श्रद्धांजलि दी है।' वर्ष 1962 में उनके कुछ प्रशंसक और शिष्यों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने कहा, 'मेरे लिए इससे बड़े सम्मान की बात और कुछ हो ही नहीं सकती कि मेरा जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए.' और तभी से पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। शिक्षक दिवस के अवसर पर शिक्षकों को पुरस्कार देकर सम्मानित भी किया जाता है।
भारत में तो हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है लेकिन अमेरिका में 2 मई को और दुनिया के कई देशों में 5 अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस 
हर साल 5 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 5 अक्टूबर, 1966 को पैरिस में अंतरसरकारी सम्मेलन का आयोजन हुआ था जिसमें 'टीचिंग इन फ्रीडम' संधि पर हस्ताक्षर किया गया था। दरअसल इस संधि में शिक्षकों के अधिकार एवं जिम्मेदारी, भर्ती, रोजगार, सीखने और सिखाने के माहौल से संबंधित सिफारिशें की गई थीं। इसी दिन 1997 में आयोजित एक सम्मेलन में उच्चतर शिक्षा से जुड़े शिक्षकों की स्थिति को लेकर की गई यूनेस्को की अनुशंसाओं को अंगीकृत किया गया था। पढ़ाई के पेशे को प्रोत्साहित करने के लिए यूनेस्को द्वारा हर साल इस दिन को मनाया जाता है। 
इन देशों में 5 अक्टूबर को शिक्षक दिवस अर्मेनिया, अजरबाइजान, बांग्लादेश, बुल्गारिया, कैमरून, कनाडा, एस्टोनिया, जर्मनी, लिथुनिया, मकदूनिया, मालद्वीव, मॉरीशस, मोलडोवा गणराज्य, मंगोलिया, म्यांमार, नीदरलैंड्स, नाइजीरिया, पाकिस्तान, फिलीपींस, कुवैत, कतर, रोमानिया, रूस, सर्बिया, संयुक्त अरब अमीरात 
संयुक्त राज्य अमेरिका 
पहले अमेरिका में 7 मार्च को शिक्षक दिवस मनाया जाता था। 1985 में मई के पहले मंगलवार को शिक्षक दिवस मनाने का फैसला किया गया। 7 मार्च को अमेरिका में शिक्षक दिवस मनाने का इतिहास कुछ इस तरह से है। 1944 में अमेरिका के एक शिक्षक मैटी वाइट वुडरिज ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी.रूजवेल्ट की पत्नी के समक्ष शिक्षक दिवस मनाने का विचार पेश किया। 1980 में अमेरिकी कांग्रेस ने 7 मार्च, को 'राष्ट्रीय शिक्षक' दिवस घोषित किया लेकिन 1985 में इसे बदल दिया गया। 
चीन 
चीन में हर साल 10 सितंबर को शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जाता है। देश में 'सांस्कृतिक क्रांति' के बाद 21 जनवरी, 1985 को शिक्षक दिवस मनाने का फैसला लिया गया था। चीन ने शिक्षाविदों और शिक्षकों के योगदान के सम्मान में 10 सितंबर को आधिकारिक अवकाश घोषित किया। 
कोलंबिया, मेक्सिको 
कोलंबिया और मेक्सिको में हर साल 15 मई को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। वहां इसकी शुरुआत 1950 में हुई थी। जॉन बातीस्त ला साल को पोप पायस 12वें के द्वारा सभी शिक्षकों का संरक्षक संत नियुक्त किया गया था जिसकी याद में इस दिन को मनाया जाता है। ला साल एक फ्रेंच प्रीस्ट थे जिन्होंने फ्रांस के गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराने और शैक्षिक सुधार के लिए काम किया था। 

Comments

Popular posts from this blog

बस इतना ही संग था तुम्हारा हमारा बेटी...!!

जोधपुर की प्रसिद्ध...हल्दी की सब्जी...और हल्दी का अचार...!!

काला चना पकौड़ा