शादी के लिए क्या है सही उम्र...!!


शादी के लिए क्या है सही उम्र...!!


अनीष व्यास 
स्वतंत्र पत्रकार 
शादी का सवाल कभी न कभी सब के सामने आता है। खासकर आजकल भागती दौड़ती जिंदगी और करियर की आपाधापी में यह सवाल और भी अहम हो गया है कि शादी की क्या उम्र होनी चाहिए।
पारंपरिक हिसाब से देखें तो भारत में 20 से 25 साल की उम्र को शादी के लिए सही समझा जाता है। बदलती सोच के मद्देनजर कुछ लोग 25 से 30 को सही उम्र बताने लगे हैं, लेकिन 28 साल के चक्रेश का कहना है कि अब पैमाना कुछ और हो गया है। वे कहते हैं कि लोग सोचते हैं कि 32 से 35 साल के बीच शादी कर लेंगे। दरअसल 20 से 30 साल की उम्र में तो आदमी अपने करियर को सेट करने में ही व्यस्त रहता है, तब शादी के लिए सोच पाना मुश्किल होता है।
कुंवारे बैठे लड़के लड़कियों की एक गंभीर समस्या आज सामान्य रुप से सभी समाजों में उभर के सामने रही है। इसमें उम्र  तो एक कारण है ही मगर समस्या अब इससे भी कहीं आगे बढ़ गई है। क्योंकि 30 से 35 साल तक की लड़कियां भी कुंवारी बैठी हुई है। इससे स्पष्ट है कि इस समस्या का उम्र ही एकमात्र कारण नहीं बचा है। ऐसे में लड़के लड़कियों के जवां होते सपनों पर तो किसी समाज के कर्ता-धर्ताओं की नजर है और ही किसी रिश्तेदार और सगे संबंधियों की। हमारी सोच कि हमें क्या मतलब है में उलझ कर रह गई है। बेशक यह सच किसी को कड़वा लग सकता है लेकिन हर समाज की हकीकत यही है, 25 वर्ष के बाद लड़कियां ससुराल के माहौल में ढल नहीं पाती है, क्योंकि उनकी आदतें पक्की और मजबूत हो जाती हैं अब उन्हें मोड़ा या झुकाया नहीं जा सकता जिस कारण घर में बहस, वाद विवाद, तलाक होता हैं बच्चे सिजेरियन ऑपरेशन से होते हैं जिस कारण बाद में बहुत सी बिमारी का सामना करना पड़ता है
शादी के लिए लड़की की उम्र 18 साल लड़के की उम्र 21 साल होनी चाहिए ये तो अब बस आंकड़ों में ही रह गया है। एक समय था जब संयुक्त परिवार के चलते सभी परिजन अपने ही किसी रिश्तेदार परिचितों से शादी संबंध बालिग होते ही करा देते थे। मगर बढ़ते एकल परिवारों ने इस परेशानी को और गंभीर बना दिया है। अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि एकल परिवार प्रथा ने आपसी प्रेम व्यवहार ही खत्म सा कर दिया है। अब तो शादी के लिए जांच पड़ताल में और कोई तो नेगेटिव करें या करें अपनी ही खास सगे संबंधी नेगेटिव कर बनते संबंध खराब कर देते है। 
ऐसा नहीं है कि आजकल की पीढ़ी का शादी पर भरोसा नहीं है या वो शादी को बंधन नहीं बल्कि कैद समझते हैं। उनकी विशलिस्ट में शादी होती है। उन्हें भी दुख होता है जब स्कूल या कॉलेज का कोई दोस्त फेसबुक पर अपनी शादी या सगाई की तस्वीर अपलोड करता है। लेकिन कुछ कारण हैं जिनकी वजह से आजकल के अधिकतर युवा 26-28 साल की उम्र के बाद ही शादी की प्लानिंग करते हैं। 

उच्च शिक्षा और हाई जॉब बढ़ा रही उम्र
यूं तो शिक्षा शुरू से ही मूल आवश्यकता रही है लेकिन पिछले डेढ़ दो दशक से इसका स्थान उच्च शिक्षा या कहे कि खाने कमाने वाली डिग्री ने ले लिया है। इसकी पूर्ति के लिए अमूमन लड़के की उम्र 23-24 या अधिक हो जाती है। इसके दो-तीन साल तक जॉब करते रहने या बिजनेस करते रहने पर उसके संबंध की बात आती है। जाहिर से इतना होते-होते लड़के की उम्र तकरीबन 30 के इर्द -गिर्द हो जाती है। इतने तक रिश्ता हो गया तो ठीक, नहीं तो लोगों की नजर तक बदल जाती है। यानि 50 सवाल खड़े हो जाते है।

चिंता देता है उम्र का यह पड़ाव
प्रकृति के हिसाब से 30 प्लस का पड़ाव चिंता देने वाला है। केवल लड़के-लड़की को बल्कि उसके माता-पिता, भाई-बहन, घर-परिवार और सगे संबंधियों को भी। सभी तरफ से प्रयास भी किए, बात भी जंच गई लेकिन हर संभव कोशिश के बाद भी रिश्ता बैठने पर उनकी चिंता और बढ़ जाती है। इतना ही नहीं, शंका-समाधान के लिए मंदिरों तक गए, पूजा-पाठ भी कराए, नामी विशेषज्ञों ने जो बताए वे तमाम उपाय भी कर लिए पर बात नहीं बनी। मेट्रीमोनी वेबसाइट्स वाट्सअप पर चलते बायोडेटा की गणित इसमें कारगार होते नहीं दिखाई देते। बिना किसी मीडिएटर के संबंध होना मुश्किल ही होता है। मगर कोई मीडिएटर बनना चाहता ही नहीं है। मगर इन्हें कौन समझाए की जब हम किसी के मीडिएटर नहीं बनेंगे तो हमारा भी कोई नहीं बनेगा। एक समस्या ये भी हम पैदा करते जा रहे है कि हम सामाजिक होकर एकांतवादी बनते जा रहे है।

परफेक्ट मैच
करीब 20-30 साल पहले, शादी के लिए लड़कियों को खाना पकाना आना और घर के कामकाज में दक्ष होना अनिवार्य होता था। वहीं, लड़कों की सैलरी और उसके खानदान का रुतबा ही शादी के लिए उसे योग्य साबित करने के लिए काफी था। लेकिन आज की तारीख में लड़के जहां पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा लड़कियों को अपना जीवनसाथी बनाना चाहते हैं, वहीं लड़कियां भी ऐसे पति की तलाश करती हैं जो न सिर्फ दफ्तर के काम करे, बल्कि घर के काम काज में भी उसका हाथ बटाए, दोनों के विचार एक दूसरे से मेल खाते हों, वो रोमांटिक हो, वगैरह वगैरह। मनचाहा पति या पत्नी पाने के लिए वो इंतज़ार करते हैं और इस चक्कर में उनकी शादी लेट होती है। 

आखिर कहां जाए युवा मन
अपने मन को समझाते-बुझाते युवा आखिर कब तक भाग्य भरोसे रहेगा। अपनों से तिरस्कृत और मन से परेशान युवा सब कुछ होते हुए भी अपने को ठगा सा महसूस करता है। हद तो तब हो जाती है जब किसी समारोह में सब मिलते हैं और एक दूसरे से घुल मिलकर बात करते हैं लेकिन उस वक्त उस युवा पर क्या बीतती है, यह वही जानता है। ऐसे में कई बार नहीं चाहते हुए भी वह उधर कदम बढ़ाने को मजबूर हो जाता है जहां शायद कोई सभ्य पुरूष जाने की भी नहीं सोचता या फिर ऐसी संगत में बैठता है जो बदनाम ही करती हो। 

ख्वाहिशें अपार, अरमान हजार
हर लड़की और उसके पिता की ख्वाहिश से आप और हम अच्छी तरह परिचित हैं। पुत्री के बनने वाले जीवनसाथी का खुद का घर हो, कार हो, परिवार की जिम्मेदारी हो, घूमने-फिरने और आज से युग के हिसाब से शौक रखता हो और कमाई इतनी तगड़ी हो कि सारे सपने पूरे हो जाएं, तो ही बात बन सकती है। हालांकि सभी की अरमान ऐसे नहीं होते लेकिन चाहत सबकी यही है। शायद हर लड़की वाला यह नहीं सोचता कि उसका भी लड़का है तो क्या मेरा पुत्र किसी ओर के लिए यह सब पूरा करने में सक्षम है। यानि एक गरीब बाप भी अपनी बेटी की शादी एक अमीर लड़के से करना चाहता है और अमीर लड़की का बाप तो अमीर से करेगा ही। ऐसे में सामान्य परिवार के लड़के का क्या होगा? यह एक चिंतनीय विषय सभी के सामने खड़ा हुआ है। संबंध करते वक्त एक दूसरे का व्यक्तिव परिवार देखना चाहिए ना कि पैसा। कई ऐसे रिश्ते भी हमारे सामने है कि जब शादी की तो लड़का आर्थिक रूप से सामान्य ही था मगर शादी बाद वह आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो गया। ऐसे भी मामले सामने आते है कि शादी के वक्त लड़का बहुत अमीर था और अब स्थिति सामान्य रह गई। इसलिए लक्ष्मी तो आती जाती है ये तो नसीबों का खेल मात्र है।

क्यों नहीं सोचता समाज
समाजसेवा करने वाले लोग आज अपना नाम कमाने के लिए लाखों रुपए खर्च करने से नहीं चूकते लेकिन बिडम्बना है कि हर समाज में बढ़ रही युवाओं की विवाह की उम्र पर कोई चर्चा करने की इस पर कार्य योजना बनाने की फुर्सत किसी को नहीं है। कहने को हर समाज की अनेक संस्थाएं हैं वे भी इस गहन बिन्दु पर चिंतित नजर नहीं आती।

पहल तो करें
हो सकता है इस मुद्दे पर समाज में पहले कभी चर्चा हुई हो लेकिन उसका ठोस समाधान अभी नजर नहीं आता। तो क्यों नहीं बीड़ा उठाएं कि एक मंच पर आकर ऐसे लड़कों लड़कियों को लाएं जो बढ़ती उम्र में हैं और समझाइश से उनका रिश्ता कहीं करवाने की पहल करें। यह प्रयास छोटे स्तर से ही शुरू हो। रोशन भारत का हर समाज के नेतृत्वकर्ताओं से अनुरोध है कि वे इस गंभीर समस्या पर चर्चा करें और एक ऐसा रास्ता तैयार करें जो युवाओं को भटकाव के रास्ते से रोककर विकास के मार्ग पर ले जा सकें। स्वार्थ समझकर परोपकार समझ कर सहयोग करें।


लिव इन रिलेशनशिप को मिली कानूनी मान्यता
भारत में नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों में से एक 'जीने का अधिकार' ('राइट टू लाइफ') के तहत लिव इन में रह रहे लोगों को कानूनी मान्यता हासिल है। पिछले साल (अप्रैल 2015) में सुप्रीम कोर्ट के दिए आदेश के मुताबिक अगर कोई लड़का और लड़की लंबे वक्त से एक दूसरे के साथ पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं, तो उन्हें शादीशुदा माना जाएगा। इसके अलावा घरेलू हिंसा कानून (प्रोटेक्शन ऑफ वूमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005) के तहत भी लिव इन में रह रही महिलाओं को साथ रह रहे पुरुष से निर्वाह-व्यय यानी ऐलमोनी मांगने का हक है। कुल मिलाकर, लिव इन रिलेशनशिप को भले ही समाज ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है, लेकिन ये गैर कानूनी भी नहीं है। इसलिए करियर बनाने में मशगूल और ज़िंदगी अपने हिसाब से जीने की तमन्ना रखने वाले शादी से पहले लिव इन रिलेशनशिप को तवज्जो देते हैं। सामने वाले को करीब से जानने के बाद ही वो शादी करने का फैसला करते हैं
लड़का-लड़की एक दूसरे को समझने के लिए वक्त चाहते हैं 
केवल लव मैरेज ही नहीं, अरेंज मैरेज करने वाले लड़के-लड़कियां भी चाहते हैं कि वो शादी से पहले अपने भावी जीवनसाथी को अच्छे से जान-समझ सकें। यही वजह है कि अब शादी से करीब 6-8 महीने पहले सगाई करने का भी प्रचलन बढ़ा है। इस दौरान लड़का-लड़की को एक दूसरे से बात करने का मौका मिलता है। वहीं, लव मैरेज करने वाले कपल काफी दिनों तक एक दूसरे को डेट करते हैं, पूरा वक्त लेते हैं एक-दूसरे को जानने-समझने भी और फिर शादी का प्रस्ताव रखते हैं।

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