या देवि सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता....!!
या देवि सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता....!!
अनीष व्यास
स्वतंत्र पत्रकार
शक्ति की उपासना के नौ दिन। देवी दुर्गा से शक्ति और सिद्धि की कामना रखने वाले तरह-तरह के कठिन व्रत करते हैं। शक्ति की सिद्धि तभी श्रेष्ठ है जब वो आपके पास हमेशा रहे, समय पड़ने पर साथ दे और जिससे आपको यश मिले। शक्ति रावण के पास भी थी, शक्ति से सम्पन्न कंस भी था लेकिन ये जीवन के उस पल में उससे हाथ धो बैठे जिस वक्त इन्हें उसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता थी। क्योंकि ये अधर्म के पक्ष में थे। शक्ति कोई सम्पत्ति नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी है। जब आपको प्रकृति से कोई ताकत मिलती है, तो वो अकेले आप के लिए नहीं होती, उसमें परमात्मा का कोई संकेत होता है, जो कहता है आपको किनके लिए शक्ति मिली, किन लोगों की सेवा और सहायता के लिए चुना गया है। भले ही वो आपके नितांत निजी तप से मिली हो, लेकिन प्रकृति और परमात्मा ने शक्ति दी है तो वो सिर्फ आपके भोग के लिए नहीं है, उस पर सबका अधिकार है, क्योंकि ये दोनों भी सभी के हैं। मान्यता है कि इन नौ दिनों में जो भी सच्चे मन से मां दुर्गा की पूजा करता है उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। यह पर्व बताता है कि झूठ कितना भी बड़ा और पाप कितना भी ताकतवर क्यों न हो अंत में जीत सच्चाई और धर्म की ही होती है।
आश्चिन मास में शुक्लपक्ष कि प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नौ दिन तक चलने वाले नवरात्र शारदीय नवरात्र कहलाते हैं। नव का शाब्दिक अर्थ नौ है और इसे नव अर्थात नया भी कहा जाता है। शारदीय नवरात्रों में दिन छोटे होने लगते है। मौसम में परिवर्तन शुरू हो जाता है। प्रकृ्ति सर्दी की चादर में लिपटने लगती है। ऋतु के परिवर्तन का प्रभाव लोगों को प्रभावित न करे, इसलिए प्राचीन काल से ही इन दिनों में नौ दिनों के उपवास का विधान है।
दरअसल, इस दौरान उपवासक संतुलित और सात्विक भोजन कर अपना ध्यान चिंतन और मनन में लगकर स्वयं को भीतर से शक्तिशाली बनाता है। इससे न वह उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करता है बल्कि वह मौसम के बदलाव को सहने के लिए आंतरिक रूप से खुद को मजूबत भी करता है।
दरअसल, इस दौरान उपवासक संतुलित और सात्विक भोजन कर अपना ध्यान चिंतन और मनन में लगकर स्वयं को भीतर से शक्तिशाली बनाता है। इससे न वह उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करता है बल्कि वह मौसम के बदलाव को सहने के लिए आंतरिक रूप से खुद को मजूबत भी करता है।
नवरात्रों में माता के नौ रुपों की आराधना की जाती है। माता के इन नौ रुपों को हम देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, उनके तीर्थो के माध्यम से समझ सकते है।
साल में दो बार नवरात्र रखने का विधान है। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नौ दिन अर्थात नवमी तक, ओर इसी प्रकार ठीक छह महीने बाद आश्चिन मास, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक माता की साधना और सिद्धि प्रारम्भ होती है। दोनों नवरात्रों में शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्व दिया जाता है
साल में दो बार नवरात्र रखने का विधान है। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नौ दिन अर्थात नवमी तक, ओर इसी प्रकार ठीक छह महीने बाद आश्चिन मास, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक माता की साधना और सिद्धि प्रारम्भ होती है। दोनों नवरात्रों में शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्व दिया जाता है
इन बातों पर निर्भर करती है शक्ति की सिद्धि
शक्ति की सिद्धि तीन बातों पर निर्भर करती है, संयम, सत्य और सद्भाव। शक्ति उसी के साथ है जिसके जीवन में ये तीन भाव भीतर तक उतरे हुए हैं। पहला संयम, शक्ति उसी के पास संचित रहती है जो संयम से रहता हो, असंयमित लोगों की शक्ति उन्हें समय पूर्व छोड़ देती है। दूसरा सत्य, शक्ति सत्य के साथ रहती है। रामायण का युद्ध हो या महाभारत का कुरुक्षेत्र, शक्ति ने उसी का साथ दिया है जो सत्य के साथ था। असत्य के साथ देने वालों को शक्ति तत्काल छोड़ देती है। तीसरा सद्भाव, जब शक्ति आए तो विनम्रता और समानता का भाव जरूरी होता है, शक्ति का यश उसी को मिलता है जो विनम्र हो, लोगों के प्रति समान भाव रखे। भेदभाव करने वाले को कभी शक्ति से यश नहीं मिलता।
आपके भीतर ही मौजूद है शक्ति
योग कहता है, शक्ति हमारे भीतर मौजूद है, जरूरत है जगाने की। इन नौ दिनों में शक्ति को जगाया जा सकता है। अगर हम इन नौ दिनों में अपने भीतर स्थित परमात्मा के अंश को रत्तीभर भी पहचान पाएं तो समझिए, नवरात्र सफल हैं। सारे नियम-कायदे, व्रत-उपवास, मंत्र-जाप, बस इसी के लिए हैं कि हम उसके दर्शन भीतर कर सकें, जिसे बाहर खोज रहे हैं। गीता में कृष्ण ने स्पष्ट कहा है, सबमें मेरा ही अंश है। फिर खोज बाहर क्यों, कोशिश करें कि इस नवरात्र मंदिरों के साथ थोड़ी यात्रा भीतर की भी हो। जब अपने अंतर में परमात्मा को देख सकेंगे, तो फिर बाहर चारों ओर उसे महसूस करेंगे। अगर हम जितना खुद के भीतर उतरेंगे, उतना परमात्मा को निकट पाएंगे। ये नवरात्र आपकी भीतरी यात्रा की शुरुआत हो सकती है।
योग कहता है, शक्ति हमारे भीतर मौजूद है, जरूरत है जगाने की। इन नौ दिनों में शक्ति को जगाया जा सकता है। अगर हम इन नौ दिनों में अपने भीतर स्थित परमात्मा के अंश को रत्तीभर भी पहचान पाएं तो समझिए, नवरात्र सफल हैं। सारे नियम-कायदे, व्रत-उपवास, मंत्र-जाप, बस इसी के लिए हैं कि हम उसके दर्शन भीतर कर सकें, जिसे बाहर खोज रहे हैं। गीता में कृष्ण ने स्पष्ट कहा है, सबमें मेरा ही अंश है। फिर खोज बाहर क्यों, कोशिश करें कि इस नवरात्र मंदिरों के साथ थोड़ी यात्रा भीतर की भी हो। जब अपने अंतर में परमात्मा को देख सकेंगे, तो फिर बाहर चारों ओर उसे महसूस करेंगे। अगर हम जितना खुद के भीतर उतरेंगे, उतना परमात्मा को निकट पाएंगे। ये नवरात्र आपकी भीतरी यात्रा की शुरुआत हो सकती है।
प्रेम से मांगिए
ये बहुत सुखद विरोधाभास है, मां जितनी कोमल होती हैं, उतनी ही कठोर भी होती हैं। सो, इस रिश्ते में प्रेम-सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता सबसे अधिक है। भक्ति निःस्वार्थ है तो मां भी प्रसन्न हैं। स्वार्थ से की गई साधना में अत्यधिक सावधानी रखनी होती है, क्योंकि ये एक अनुबंध की तरह होती है, मैं ये करूंगा तो आप मुझे ये सिद्धि देंगी। मामला जब अनुबंध का है तो सावधानी ज्यादा रखनी है। क्योंकि अनुबंध की शर्तें पूरी नहीं हुईं तो दंड भी भोगना पड़ सकता है। परमात्मा को कभी शर्तों में ना बांधें, वो व्यापारी नहीं है। उसे सिर्फ प्रेम से ही जीता जा सकता है। अगर मन सिर्फ मां के प्रेम में डूबा है, कोई सिद्धि की आकांक्षा नहीं है तो फिर कोई सावधानी भी नहीं है। दरअसल, मन में प्रेम, सेवा और सत्य का भाव होना ही सबसे बड़ी भक्ति है। लोग कहते हैं नवरात्र के व्रतों में कोई गलती हो जाए तो परिणाम भी भयंकर होते हैं। सोचने वाली बात है, क्या मां इतनी कठोर होती हैं? कभी नहीं। मां से ज्यादा कोमल तो कोई शब्द इस सृष्टि में बना ही नहीं है। फिर क्यों मां की साधना के नियम इतने कठोर हैं? कठोर नियम उनके लिए हैं जो हक से ज्यादा मांगना चाहते हैं। जब बच्चे को कोई चीज बिना मां की मर्जी के लेनी होती है तो वो जिद करता है। पूरे ब्रह्मांड में मां ही ऐसी शक्ति है जो बिना कहे जान जाती है कि बच्चे को क्या चाहिए। बशर्ते बच्चे के मन में वो निश्चल भाव हो, प्रेम हो और सत्य हो। ये तीन बातें आपके भीतर हैं तो मां से कुछ मांगने की जरूरत नहीं है, वो स्वयं आपको आवश्यकता ही हर चीज देंगी। मां से जो मांगना है, प्रेम से मांगिए, जिद किसी मां को अच्छी नहीं लगती।
ये बहुत सुखद विरोधाभास है, मां जितनी कोमल होती हैं, उतनी ही कठोर भी होती हैं। सो, इस रिश्ते में प्रेम-सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता सबसे अधिक है। भक्ति निःस्वार्थ है तो मां भी प्रसन्न हैं। स्वार्थ से की गई साधना में अत्यधिक सावधानी रखनी होती है, क्योंकि ये एक अनुबंध की तरह होती है, मैं ये करूंगा तो आप मुझे ये सिद्धि देंगी। मामला जब अनुबंध का है तो सावधानी ज्यादा रखनी है। क्योंकि अनुबंध की शर्तें पूरी नहीं हुईं तो दंड भी भोगना पड़ सकता है। परमात्मा को कभी शर्तों में ना बांधें, वो व्यापारी नहीं है। उसे सिर्फ प्रेम से ही जीता जा सकता है। अगर मन सिर्फ मां के प्रेम में डूबा है, कोई सिद्धि की आकांक्षा नहीं है तो फिर कोई सावधानी भी नहीं है। दरअसल, मन में प्रेम, सेवा और सत्य का भाव होना ही सबसे बड़ी भक्ति है। लोग कहते हैं नवरात्र के व्रतों में कोई गलती हो जाए तो परिणाम भी भयंकर होते हैं। सोचने वाली बात है, क्या मां इतनी कठोर होती हैं? कभी नहीं। मां से ज्यादा कोमल तो कोई शब्द इस सृष्टि में बना ही नहीं है। फिर क्यों मां की साधना के नियम इतने कठोर हैं? कठोर नियम उनके लिए हैं जो हक से ज्यादा मांगना चाहते हैं। जब बच्चे को कोई चीज बिना मां की मर्जी के लेनी होती है तो वो जिद करता है। पूरे ब्रह्मांड में मां ही ऐसी शक्ति है जो बिना कहे जान जाती है कि बच्चे को क्या चाहिए। बशर्ते बच्चे के मन में वो निश्चल भाव हो, प्रेम हो और सत्य हो। ये तीन बातें आपके भीतर हैं तो मां से कुछ मांगने की जरूरत नहीं है, वो स्वयं आपको आवश्यकता ही हर चीज देंगी। मां से जो मांगना है, प्रेम से मांगिए, जिद किसी मां को अच्छी नहीं लगती।
वास्तव में बिना तप शक्ति मिलना संभव नहीं है। अभ्यास के तप के बिना ज्ञान की शक्ति नहीं मिलती। व्रत पालन से हठयोग तक, कई रास्ते हैं जो शक्ति की सिद्धि तक ले जाते हैं। फिर भी हम कहीं चूक रहे हैं, कुछ ऐसा है जो भूल रहे हैं, कहीं कोई त्रुटि जरूर हो रही है, जो नवरात्रों की इतनी साधना के बाद भी शक्ति के दर्शन से हम कुछ कदम दूर रह जाते हैं।
शायद संकल्प का अभाव। लोग नौ दिन तक सारे वो काम छोड़ देते हैं जो भक्ति में बुरे माने जाते हैं। नौ दिन मांसाहार बंद, शराब बंद ऐसी ही कई लतें, लेकिन दसवें दिन से सब शुरू। नौ दिन में जो कमाया, वो दसवें दिन गवाने की प्रक्रिया में जुट जाते हैं। सही मायनों में, नवरात्र के नौ दिन सिद्धि प्राप्ति से ज्यादा शक्ति को पाने की शुरुआत करने के हैं। ये नौ दिन प्रारंभिक प्रक्रिया है, संपूर्ण सिद्धि नौ दिन में नहीं मिल सकती। संकल्प लेना होगा, जो दुर्व्यसन इस नवरात्र में छोड़ेंगे, वो फिर कभी शुरू नहीं होंगे। ये नौ दिन तप को शुरू करने के हैं। मंत्र सिद्धि के हैं। इससे शुरुआत करनी है, ये नौ दिन तो भक्ति में डूबने के हैं। यहां अपने आप पर कई प्रतिबंध लगाकर देवी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता, अगर फिर से उन्हें शुरू ही करना है तो नौ दिन कुछ भी छोड़ना ढकोसला मात्र है।
नारी ही शक्ति है, उसका सम्मान जरुरी
नवरात्र देवि की आराधना के लिए हैं। नारी स्वयं देवि है क्योंकि वो जन्म देती है। मंदिरों में दर्शन से गरबों में आराधना तक, अगर नारी के लिए मन में अच्छे भाव नहीं हैं तो नवरात्र साधना कठिन नियमों के पालन के बावजूद भी बेकार है। शास्त्र कहते हैं.....
नवरात्र देवि की आराधना के लिए हैं। नारी स्वयं देवि है क्योंकि वो जन्म देती है। मंदिरों में दर्शन से गरबों में आराधना तक, अगर नारी के लिए मन में अच्छे भाव नहीं हैं तो नवरात्र साधना कठिन नियमों के पालन के बावजूद भी बेकार है। शास्त्र कहते हैं.....
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः, स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्, का ते स्तुतिः स्तव्यपरापरोत्किः।।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्, का ते स्तुतिः स्तव्यपरापरोत्किः।।
अर्थ – जगत् की सम्पूर्ण विद्या (परा, अपरा व चतुर्दश) भगवती शक्ति के ही भेद हैं और सम्पूर्ण स्त्रियां भी उसी का अंग हैं।
शिव अगर प्रथम पुरुष हैं तो देवि प्रकृति हैं। पुरुष और प्रकृति ने ही सारी सृष्टि की रचना की है। इसलिए, शक्ति को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो महिलाओं के लिए मन से हीन और खेदजनक भावनाएं निकाल दें। तभी देवी की कृपा मिल सकती है। अन्यथा देवी के लिए किया कोई भी अन्य जतन उन्हें प्रसन्न नहीं कर सकता, अगर नारी जाति का सम्मान नहीं किया गया।
शारदीय नवरात्रि की तिथियां
29 सितंबर 2019: नवरात्रि का पहला दिन, प्रतिपदा, कलश स्थापना, चंद्र दर्शन और शैलपुत्री पूजन.
30 सितंबर 2019: नवरात्रि का दूसरा दिन, द्वितीया, बह्मचारिणी पूजन.
01 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का तीसरा दिन, तृतीया, चंद्रघंटा पूजन.
02 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का चौथा दिन, चतुर्थी, कुष्मांडा पूजन.
03 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का पांचवां दिन, पंचमी, स्कंदमाता पूजन.
04 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का छठा दिन, षष्ठी, सरस्वती पूजन.
05 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का सातवां दिन, सप्तमी, कात्यायनी पूजन.
06 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का आठवां दिन, अष्टमी, कालरात्रि पूजन, कन्या पूजन.
07 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का नौवां दिन, नवमी, महागौरी पूजन, कन्या पूजन, नवमी हवन, नवरात्रि पारण
08 अक्टूबर 2019: विजयदशमी या दशहरा
मां दुर्गा को लाल रंग खास पसंद है इसलिए लाल रंग का ही आसन खरीदें। इसके अलावा कलश स्थापना के लिए मिट्टी का पात्र, जौ, मिट्टी, जल से भरा हुआ कलश, मौली, इलायची, लौंग, कपूर, रोली, साबुत सुपारी, साबुत चावल, सिक्के, अशोक या आम के पांच पत्ते, नारियल, चुनरी, सिंदूर, फल-फूल, फूलों की माला और श्रृंगार पिटारी भी चाहिए।
कलश स्थापना कैसे करें?
नवरात्रि के पहले दिन यानी कि प्रतिपदा को सुबह स्नान कर लें।
मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद सबसे पहले गणेश जी का नाम लें और फिर मां दुर्गा के नाम से अखंड ज्योत जलाएं। कलश स्थापना के लिए मिट्टी के पात्र में मिट्टी डालकर उसमें जौ के बीज बोएं।
अब एक तांबे के लोटे पर रोली से स्वास्तिक बनाएं। लोटे के ऊपरी हिस्से में मौली बांधें।
अब इस लोटे में पानी भरकर उसमें कुछ बूंदें गंगाजल की मिलाएं। फिर उसमें सवा रुपया, दूब, सुपारी, इत्र और अक्षत डालें।
इसके बाद कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते लगाएं।
अब एक नारियल को लाल कपड़े से लपेटकर उसे मौली से बांध दें। फिर नारियल को कलश के ऊपर रख देंv
अब इस कलश को मिट्टी के उस पात्र के ठीक बीचों बीच रख दें जिसमें आपने जौ बोएं हैं।
कलश स्थापना के साथ ही नवरात्रि के नौ व्रतों को रखने का संकल्प लिया जाता है।
आप चाहें तो कलश स्थापना के साथ ही माता के नाम की अखंड ज्योति भी जला सकते हैं।
शारदीय नवरात्रि की तिथियां
29 सितंबर 2019: नवरात्रि का पहला दिन, प्रतिपदा, कलश स्थापना, चंद्र दर्शन और शैलपुत्री पूजन.
30 सितंबर 2019: नवरात्रि का दूसरा दिन, द्वितीया, बह्मचारिणी पूजन.
01 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का तीसरा दिन, तृतीया, चंद्रघंटा पूजन.
02 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का चौथा दिन, चतुर्थी, कुष्मांडा पूजन.
03 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का पांचवां दिन, पंचमी, स्कंदमाता पूजन.
04 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का छठा दिन, षष्ठी, सरस्वती पूजन.
05 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का सातवां दिन, सप्तमी, कात्यायनी पूजन.
06 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का आठवां दिन, अष्टमी, कालरात्रि पूजन, कन्या पूजन.
07 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का नौवां दिन, नवमी, महागौरी पूजन, कन्या पूजन, नवमी हवन, नवरात्रि पारण
08 अक्टूबर 2019: विजयदशमी या दशहरा
कलश स्थापना
नवरात्रि में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश स्थापना को घट स्थापना भी कहा जाता है। नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना के साथ ही होती है। घट स्थापना शक्ति की देवी का आह्वान है। मान्यता है कि गलत समय में घट स्थापना करने से देवी मां क्रोधित हो सकती हैं। रात के समय और अमावस्या के दिन घट स्थापित करने की मनाही है। घट स्थापना का सबसे शुभ समय प्रतिपदा का एक तिहाई भाग बीत जाने के बाद होता है। अगर किसी कारण वश आप उस समय कलश स्थापित न कर पाएं तो अभिजीत मुहूर्त में भी स्थापित कर सकते हैं। प्रत्येक दिन का आठवां मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त कहलाता है। सामान्यत: यह 40 मिनट का होता है। हालांकि इस बार घट स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त उपलब्ध नहीं है।
नवरात्रि में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश स्थापना को घट स्थापना भी कहा जाता है। नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना के साथ ही होती है। घट स्थापना शक्ति की देवी का आह्वान है। मान्यता है कि गलत समय में घट स्थापना करने से देवी मां क्रोधित हो सकती हैं। रात के समय और अमावस्या के दिन घट स्थापित करने की मनाही है। घट स्थापना का सबसे शुभ समय प्रतिपदा का एक तिहाई भाग बीत जाने के बाद होता है। अगर किसी कारण वश आप उस समय कलश स्थापित न कर पाएं तो अभिजीत मुहूर्त में भी स्थापित कर सकते हैं। प्रत्येक दिन का आठवां मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त कहलाता है। सामान्यत: यह 40 मिनट का होता है। हालांकि इस बार घट स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त उपलब्ध नहीं है।
कलश स्थापना की तिथि और शुभ मुहूर्त
कलश स्थापना की तिथि: 29 सितंबर 2019
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त: 29 सितंबर 2019 को सुबह 06 बजकर 16 मिनट से 7 बजकर 40 मिनट तक.
कुल अवधि: 1 घंटा 24 मिनट
कलश स्थापना की सामग्री कलश स्थापना की तिथि: 29 सितंबर 2019
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त: 29 सितंबर 2019 को सुबह 06 बजकर 16 मिनट से 7 बजकर 40 मिनट तक.
कुल अवधि: 1 घंटा 24 मिनट
मां दुर्गा को लाल रंग खास पसंद है इसलिए लाल रंग का ही आसन खरीदें। इसके अलावा कलश स्थापना के लिए मिट्टी का पात्र, जौ, मिट्टी, जल से भरा हुआ कलश, मौली, इलायची, लौंग, कपूर, रोली, साबुत सुपारी, साबुत चावल, सिक्के, अशोक या आम के पांच पत्ते, नारियल, चुनरी, सिंदूर, फल-फूल, फूलों की माला और श्रृंगार पिटारी भी चाहिए।
कलश स्थापना कैसे करें?
नवरात्रि के पहले दिन यानी कि प्रतिपदा को सुबह स्नान कर लें।
मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद सबसे पहले गणेश जी का नाम लें और फिर मां दुर्गा के नाम से अखंड ज्योत जलाएं। कलश स्थापना के लिए मिट्टी के पात्र में मिट्टी डालकर उसमें जौ के बीज बोएं।
अब एक तांबे के लोटे पर रोली से स्वास्तिक बनाएं। लोटे के ऊपरी हिस्से में मौली बांधें।
अब इस लोटे में पानी भरकर उसमें कुछ बूंदें गंगाजल की मिलाएं। फिर उसमें सवा रुपया, दूब, सुपारी, इत्र और अक्षत डालें।
इसके बाद कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते लगाएं।
अब एक नारियल को लाल कपड़े से लपेटकर उसे मौली से बांध दें। फिर नारियल को कलश के ऊपर रख देंv
अब इस कलश को मिट्टी के उस पात्र के ठीक बीचों बीच रख दें जिसमें आपने जौ बोएं हैं।
कलश स्थापना के साथ ही नवरात्रि के नौ व्रतों को रखने का संकल्प लिया जाता है।
आप चाहें तो कलश स्थापना के साथ ही माता के नाम की अखंड ज्योति भी जला सकते हैं।
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