नया कार्य शुरू करने के लिए भी शुभ हैं नवरात्रि

नया कार्य शुरू करने के लिए भी शुभ हैं नवरात्रि

अनीष व्यास 
स्वतंत्र पत्रकार
नवरात्र पर किया गया पूजा-पाठ मनोवांछित फल की प्राप्ति कराने वाला होता है। बस, आवश्यकता है शुद्ध आचार-व्यवहार, सही विधि और पूजा हेतु सही स्थान के चयन करने की। नवरात्र में किए गए कार्य भी शुभ फलदाई होते हैं। 
उत्तर-पूर्व वास्तु पुरुष का सिर यानी मस्तिष्क होता है। मस्तिष्क हमारे द्वारा किए जाने वाले सारे क्रिया-कलापों को नियंत्रित करता है। यह आवश्यक नहीं है कि आप कितने समय तक पूजा करते हैं, बल्कि आवश्यक यह है कि आप कितनी तन्मयता से पूजा करते हैं। सही स्थान पर बनाया गया पूजा स्थल आपको एकाग्रता प्रदान करता है, जिससे आपका पूजन फलदायी बनता है। जिस कक्ष में पूजा-स्थल बना हो, वहां सूर्य की रोशनी एवं ताजा हवा का समुचित प्रबंध हो। पूजा  कक्ष में मृतकों, पूर्वजों आदि के चित्र नहीं रखने चाहिए। 
दक्षिण दिशा यम की दिशा मानी जाती है। इस दिशा में पूजा स्थल या वेदी की स्थापना नहीं करनी चाहिए। यह पूजा सार्थक नहीं होती। इसी प्रकार दक्षिण-पश्चिम में की गयी पूजा अनावश्यक खर्चों को आमंत्रित करती है।  
किसी नए कार्य की शुरुआत या निवेश के लिए भी नवरात्रों को शुभ माना जाता है। मकान खरीदने जैसा अहम निर्णय अकसर लोग नवरात्रों में करना उचित समझते हैं। अगर आप भी इस नवरात्र मकान खरीदने या निर्माण आरंभ करने जा रहे हैं तो कुछ बातों का ख्याल अवश्य रखें। 

भवन निर्माण के लिए खुदाई की शुरुआत सही दिशा से किया जाना आवश्यक है। यदि खुदाई अथवा नींव का कार्य गलत दिशा से आरंभ किया गया है तो ऐसे में निर्माण में अनावश्यक अड़चनों का सामना करना पड़ता है। यदि भवन के चारों ओर बहता हुआ जल है तो ऐसा भवन निवास हेतु उत्तम माना जाता है। अगर भवन के आसपास कोई जल स्रोत है तो वह किस दिशा में है, यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है। भवन के उत्तर में बहता पानी लक्ष्मी के आगमन का परिचायक है। इसलिए ऐसी इमारत में, जिसके उत्तर में पानी का स्रोत है, किया गया निवेश अच्छा मुनाफा देता है। अगर संभव हो सके तो भवन के चारों और खाली जगह छोड़नी चाहिए। दक्षिण, पश्चिम की तुलना में उत्तर व पूर्व में ज्यादा खाली जगह छोड़नी चाहिए। फर्श की ढलान उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें। अंडरग्राउंड वाटर टैंक के लिए उत्तर-पूर्व एवं पूर्व दिशा श्रेष्ठ हैं, तो ओवरहेड वाटर टैंक दक्षिण-पश्चिम या पश्चिम में बना सकते हैं। कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि बहुमंजिला इमारतें रहने के लिए उपयुक्त नहीं होतीं, क्योंकि उनमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति का अभाव होता है। यह तर्क सही नहीं है। बहुमंजिला इमारतें भी वास्तु की दृष्टि से रहने के लिए पूरी तरह अनुकूल होती हैं। इन इमारतों में कॉस्मिक ऊर्जा अधिक होती है, जो कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति की तरह ही महत्वपूर्ण होती है। 

भोग लगाए होगी बाधा दूर 

नवरात्र पर्व पर माता की आराधना के साथ ही व्रत-उपवास और पूजन की विशेष महत्व है। नवरात्र के नौ दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। अन्नपूर्णा मंदिर के पुजारी पंडित दिनेश शास्त्री के अनुसार नौ दिनों में माता को प्रत्येक दिन के अनुसार भोग अर्पित करने से मां सभी प्रकार की समस्याओं को दूर करती हैं।
प्रथम दिन मां के दिव्य स्वरूप शैलपुत्री के चरणों में गाय का शुद्ब देसी घी अर्पित करने से आरोग्य का आर्शीवाद मिलता है तथा सभी व्याधाएं दूर होती हैं। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग लगाने से आयु में वृद्बि होती है। तृतीया स्वरूप मां चंद्रघंटा को दूध या फिर दूध से बनी मिठाई, खीर अर्पित करने से बाधाओं से मुक्ति मिलती है। चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा को मालपुए का भोग लगाकर मंदिर में दान करने से बुद्बि का विकास व निर्णय शक्ति मिलती है। ऐसे ही मां के पंचम स्वरूप स्कंदमाता माता को केले का नैवेध चढ़ाने से उत्तम स्वास्थ्य व निरोगी काया की प्राप्ति होती है। छठे स्वरूप मां कात्यायनी को इस दिन शहद का भोग लगाने से मनुष्य के आकर्षण में वृद्बि होती है। सातवें दिन मां के कालरात्रि स्वरूप की आराधना कर मां को गुड़ चढ़ाने व उसे ब्नाहमण को दान करने से शोक तथा आकस्मिक संकट से मां रक्षा करती हैं।
अष्ठम स्वरूप महागौरी को नारियल का भोग लगाने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। ऐसे ही नवम स्वरूप मां सिद्बरात्रि को तिल के लड्डू व अनार अर्पित करने से अनहोनी घटनाएं से बचाव होता है।
नवरात्रि में भूलकर भी न करें ये छह काम
1- कन्याओं का दिल न दुखाएं-
भारतीय परंपरा में कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप माना गया है। यही कारण है कि नवरात्रि में कन्या पूजन या कंजका पूजन कर लोग पुण्य की प्राप्ति करते हैं। माना जाता है नवरातों दौरान किसी भी कन्या या महिला के प्रति असम्मान का भाव न आने दें। शास्त्रों में यहां तक कहा गया है कि यत्र नार्यास्तु पूजयंते रमंते तत्र देवता। किसी भी कन्या का अपमान होने पर मां दुर्गा नाराज हो सकती हैं।
2- घर अकेला न छोड़ें
यदि आपने घर में कलश स्थापना की है या माता की चौकी या अखंड ज्योति लगा रखी है तो घर खाली ना छोड़े। यानी घर में किसी न किसी का होना बहुत जरूरी है। साथ व्रत के दिनों में दिन में सोना भी मना है।
3- कलह से दूर रहें-
नवरात्रि के दिनों में बहुते स लोग व्रत में होते हैं ऐसे मे कलह करने से बचना चाहिए। क्योंकि कलह से व्रतधारी की आत्मा को दुख पहुंचता है जिससे देवी मां रुष्ठ हो सकती हैं। ऐसे में कोशिश करें कि हर प्रकार के वाद विवाद से दूर रहें। श्रीराम चरित मानस में भी ऐसा कहा गया है कि "जहां सुमति तहां संपति नाना। जहां कुमति तहां विपति निदाना।।" लड़ाई झगड़े वाले घर में लक्ष्मी नहीं ठहरतीं।
4- धार्मिक बातों में मन लगाएं
माना जाता है कि व्रत करने वाले को नवरात्रि नौ दिनों तक अपना समय फिज्यूल की बातों में न लगाकर धार्मिक ग्रंथों का अध्यन करना चाहिए। इन दिनों दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तसती का पाठ कर सकते हैं।
5 - लहसुन प्याज का सेवन न करें
नवरात्रि के पावन दिनों में सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। आहार, व्यवहार और विचार में आपके सात्विकता होना जरूरी है तभी नवरात्रि के व्रत कापूरा लाभ मिल सकेगा। आप इन दिनों प्याज लहसुन और मांस मदिरा का सेवन ना करें। नवरात्रि के नौ दिनों तक पूर्ण सात्विक आहार लेना चाहिए।
6- काम वासना पर काबू रखें-
नवरात्रि के दिनों में काम भावना पर नियंत्रण रखना अतिआवश्यक हैं। इन दिनो में महिलाओं और पुरुष दोनो को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। मां की पूजा अर्चना साफ मन से करने से ही मां प्रसन्न होती है इसलिए इन दिनों शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए।
नवरात्र की कथाएं 
नवरात्र के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं, पर निम्न दो कथाएं सर्वाधिक तार्किक एवं प्रचलित हैं। पहली कथा है- ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण का वध करने के लिए चण्डी देवी की उपासना कर उन्हें प्रसन्न करने के लिए कहा था। चण्डी पाठ एवं हवन के लिए दुर्लभ नीलकमल की भी व्यवस्था स्वयं ब्रह्माजी ने कर दी। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरत्व के लिए चण्डी पाठ शुरू कर दिया। यह बात पवन के माध्यम से इन्द्र ने श्रीराम तक पहुंचा दी। इधर रावण ने राम की पूजा बाधित करने के लिए मायावी तरीके से पूजा-स्थल से एक नीलकमल गायब कर दिया। तभी श्रीराम को स्मरण हुआ कि उन्हें ‘नवकंजलोचन’ (कमलनयन) भी कहा जाता है। श्रीराम ने अपने एक नेत्र को मां की आराधना में समर्पित करने के उद्देश्य से जैसे ही तुणीर से बाण निकाल कर अपने नेत्र में चलाना चाहा, वैसे ही मां दुर्गा ने श्रीराम के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर उन्हें विजयश्री का आशीर्वाद प्रदान कर किया। इस प्रकार रावण का वध हुआ और तब से मां दुर्गा की उपासना का पर्व ‘नवरात्र’ मनाया जाने लगा। दूसरी कथा है- महिषासुर की उपासना से प्रसन्न होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। महिषासुर ने इसका दुरुपयोग शुरू कर दिया। वह सूर्य, चन्द्र, इन्द्र आदि देवताओं के अधिकार छीन स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। उसके भय से पीड़ित देवताओं को स्वर्गलोक छोड़ कर मत्र्यलोक में रहना पड़ा। तब महिषासुर का नाश करने के लिए देवताओं ने मां दुर्गा की रचना की। देवताओं ने मां दुर्गा को बल प्रदान करने के लिए सभी अस्त्र-शस्त्र उन्हें प्रदान कर दिए। अंत में महिषासुर का वध कर मां दुर्गा ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं। इस प्रकार नवरात्र का त्योहार प्रारंभ हुआ।
अखंड ज्योत का महत्व
अखंड ज्योत में जलने वाला दीपक दिन-रात जलता रहता है। मान्‍यता है कि अखंड दीपक व्रत की समाप्‍ति तक बुझना नहीं चाहिए। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार नवरात्रि के दौरान मां के समक्ष अखंड ज्‍योत जलाने के पीछे एक अहम वजह बताई जाती है। माना जाता है कि जिस तरह घोर अंधेरे में एक छोटा-सा दीपक विपरीत परिस्थितियों में रहकर अपने आस-पास का अंधेरा दूर कर उस जगह को रोशनी से भर देता है उसी तरह माता के भक्त भी मां की आस्‍था के सहारे अपने जीवन के अंधकार को मिटा सकते हैं। 
 
अखंड ज्योत से जुड़े नियम-

अखंड ज्योत जलाने के लिए हमेशा सामान्‍य से थोड़े बड़े आकार का दीपक पूजा के लिए चुनें। इसके लिए आप मिट्टी के दीपक का भी चुनाव कर सकते हैं। पूजा के लिए मिट्टी और पीतल के दीपक को शुद्ध माना जाता है। 
अखंड ज्‍योति का दीपक हमेशा किसी ऊंचे स्थान पर रखें। उसे कभी खाली जमीन पर नहीं रखना चाहिए।
पूजा के दीपक को जलाने से पहले उसे किसी ऊंचे स्थान जैसे पटरे या चौकी पर रखने से पहले उसमें गुलाल या रंगे हुए चावलों से अष्‍टदल बना लें। 
नवरात्रि के दौरान व्रत रखने वाले बहुत कम ही लोग इस बात को जानते हैं कि अखंड ज्‍योति की बाती रक्षा सूत्र से बनाई जाती है। इसके लिए सवा हाथ का रक्षा सूत्र लेकर उसे बाती की तरह बनाएं और फिर दीपक के बीचों-बीच रखें।
अखंड ज्‍योति जलाने के लिए घी ,सरसों या तिल के तेल का इस्‍तेमाल किया जा सकता है। 
दीपक जलाते समय ध्यान रखें कि अगर आप घी का दीपक जला रहे हैं तो उसे देवी मां के दाहिने तरफ,अगर दीपक तेल का है तो उसे देवी मां के बाईं तरफ रखना चाहिए।  
दीपक जलाने से पहले गणेश भगवान, मां दुर्गा और भगवान शिव का ध्‍यान अवश्य करें। 

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