मंगल नहीं करता अमंगल...!!
मंगल नहीं करता अमंगल...!!
अनीष व्यास
ज्योतिषविद् एवं कुण्डली
विश्ल़ेषक
मंगल ग्रह से
आमतौर पर लोग
डरते है लेकिन
जिसका नाम ही
मंगल हो वह
अमंगल कैसे कर
सकता है। यह
ग्रह मंगल देव
है लेकिन अशुभ
नहीं है। जन्म
कुण्डली में हर
ग्रह शुभ और
अशुभ फल देते
है। ऐसे ही
मंगल ग्रह भी
दोनों तरह के
फल देते है।
यह ग्रह सदैव
सभी के लिए
कौतुहल यानि चर्चा
का विषय रहा
हैं। ज्योतिष में
मंगल देव को
काल पुरूष का
पराक्रम माना गया
है। ग्रह मण्डल
में इन्हें सेनापति
का पद दिया
गया है। मंगल
देव पराक्रम, स्फूर्ति,
साहस, आत्मविश्वास, धैर्य,
देश प्रेम, बल,
रक्त, महत्वकांक्षा एवं
शस्त्र विद्या के अधिपति
माने गए है।
यहां आपको विशेष
रूप से बताना
चाहता हूं कि
अग्नि तत्व होने
से मंगल सभी
प्राणियों को जीवन
शक्ति देता है।
यह प्रेरणा, उत्साह
एवं साहस का
प्रेरक होता है।
मंगल से मंगली
योग कैसे बनता
है? क्या इसके
लाभ है?
मंगली योग/दोष
क्या है.
यदि आप से
कोई हाल पूछता
है तो आप
कहते है सब
कुशल-मंगल हैं।
यानि कि सब
कुछ सही एवं
शुभ है। जब
मंगल होता है
तभी अमंगलों का
नाश हो जाता
है। मंगल भवन
अमंगलकारी रामायण की चैपाई
सुनी है आपने,
यानि जो अमंगल
का हरण करें,
वह मंगल है।
यहीं बात मंगल
ग्रह के बारे
में कही गई
है। मंगल उग्र
ग्रह है, लेकिन
अशुभ नहीं है।
किसी की भी
कुण्डली में प्रथम,
चतुर्थ, सप्तम, अष्टम एवं
द्वादश भाव में
अगर मंगल है,
तो वह मंगली
योग कहलाता है।
मांगलिक नहीं, मंगली योग
होता है। मांगलिक
कार्य होते है
और मंगली योग
होता है। हम
जब भी देखते
है तो लड़की
या लड़के के
माता-पिता कहते
है कि मांगलिक
हैं, या कहते
है कि मांगलिक
दोष है। मांगलिक
शब्द का अर्थ
होता है शुभ
कार्य। मांगलिक योग हो
सकता है, लेकिन
मांगलिक दोष नहीं
हो सकता है।
मंगलिक नहीं मंगली
होता है। मंगली
योग जिन जातको
या कुण्डली में
होता है उनका
विवाह समय पर
नहीं हो पाता
है या बाधाएं
आती है। मंगली
योग से उत्पन्न
होने वाली बाधाओं
के बारे में
जानने से पहले
आपको श्रीकृष्ण के
विवाह में उत्पन्न
हुई बाधाओं के
बारे में जानकारी
हो । किस
प्रकार श्रीकृष्ण ने मंगल
देव को शांत
किया और विवाह
में उत्पन्न बाधाओं
को पार किया।
मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम
गरूड़ ध्वज।
मंगलम पुण्डरिकांक्ष, मंगलाय तनो हरिः।।
ऐसे हुआ चलन
मांगलिक वस्तुओ का
श्रीकृष्ण ने अपने
विवाह के समय
भगवान श्री गणेश
की सहायता से
मंगल देव संबंधित
वस्तुओं का प्रयोग
कर मंगल देव
को प्रसन्न किया।
श्रीकृष्ण द्वारा की गई
सभी मांगलिक वस्तुएं
विवाह की रस्म
बन गई है।
मांगलिक वस्तुएं मंगली व्यक्ति
की कुण्डली हो
या नहीं होने
पर भी विवाह
का पार्ट यानि
अंग बन गई
है। भगवान श्रीकृष्ण
की कुण्डली में
मंगली योग नहीं
था। वृषभ लग्न
में जन्में श्रीकृष्ण
के नवम् भाव
में मंगल देव
विराजमान है। अतः
मांगलिक योग नहीं
बनता। फिर भी
मंगल देव ने
विवाह में विघ्न
उत्पन्न कर श्रीकृष्ण
को क्यों परेशान
किया? श्रीकृष्ण रूकमणी
से विवाह रचाने
के लिए बारात
लेकर द्वारका से
रवाना हुए। भगवान
विष्णु के अवतार
श्रीकृष्ण के विवाह
में बाधा उत्पन्न
हो जाएं, यह
आश्चर्य की बात
हैं, लेकिन ऐसा
हुआ। श्रीकृष्ण रथ
पर सवार होकर
बारातियों के साथ
निकले और कुछ
दूर चलने पर
उन्होंने देखा कि
चूहे जमीन में
बड़े-बड़े गड्डे
बना रहे है
और उनका रथ
उन गड्डों में
कभी हिचकोले खाता
है और कभी
फंस जाता था।
श्रीकृष्ण और बाराती
परेशान होकर बोले
ये क्या हो
रहा है। मैनेजमंेट
गुरू श्रीकृष्ण ने
विघ्नहर्ता श्री गणेश
का स्मरण किया।
श्री गणेश तुरंत
उन्हे समक्ष प्रकट
हो गए। श्री
कृष्ण ने कहा
विघ्न-विनायक ये
क्या हो रहा
है? तब श्री
गणेश ने कहा
कि आपने जाने-अनजाने में मेरी
और भूमि पुत्र
मंगल देव की
उपेक्षा कर दी
है। श्रीकृष्ण ने
आश्चर्य चकित हो
कर पूछा वह
कैसे? तब गणेश
जी ने बताया
कि प्रथम पूज्य
विनायक गणेश की
आपने पूजा नही
की और न
ही उन्हें निमंत्रण
दिया। इसके साथ
ही आप बारात
लेकर रवाना भी
हो गए, लेकिन
भूमि पूजन नहीं
किया यानि ग्राम
देवता की पूजा
नहीं की। जाने
अनजाने में हुई
गलती को भगवान
भी माफ करते
हैं, बस आपका
मन पवित्र होना
चाहिए। अगर कोई
समस्या है तो
उसका समाधान भी
है। अगर गलती
हुई तो उसका
समाधान भी है,
घबराने की जरूरत
नहीं है। बस
मार्गदर्शन यानि परामर्श
जरूरी है। गणेश
ने कहा कि
विनायक की पूजा
कर उन्हें न्यौता
देकर घर में
विराजमान करते है,
और बारात रवाना
करने से पहले
भूमि पूजन करते
है तो कोई
विघ्न नहीं होता
है। मेरे नाराज
हो जाने से
मेरी सवारी चूहे
ने आपके मार्ग
में विघ्न पैदा
कर दिया। इसके
साथ ही भूमि
पुत्र होने के
कारण मंगल देव
भी आपके द्वारा
भूमि पूजन नहीं
करने से नाराज
है। आपने मुझे
स्मरण किया है,
अतः अपने चूहों
को रोक रहा
हूं लेकिन हर
जातक को विवाह
पूर्व मूझे विनायक
के रूप में
आंमत्रित कर घर
में विराजमान करना
होगा, तभी विवाह
निर्विघ्न सम्पन्न होंगे। इसलिए
आज भी विवाह
के पूर्व शहर
के प्रमुख मंदिर
से प्रतिकात्मक रूप
से विघ्न विनाशक
श्री विनायक को
अपने घर लेकर
आते है एवं
विवाह निर्विघ्न होने
के बाद उन्हे
वापस मंदिर पहुँचाते
है।
।।श्री गणेशाय नमः।।”
“विघ्न हरण मंगल
करण, गणनायक गणराज।
प्रथम निमंत्रण आपको, सकल
सुधरो काज।।”
श्री गणेश ने
कहा कि मैं
प्रसन्न हूं, पर
आपको मंगल देव
को मनाना होगा।
तब श्रीकृष्ण ने
कहा जैसे आप
कहें। फिर चूहों
ने खड्डे बनाना
बंद कर दिए
और मंगल देव
को प्रसन्न करने
के लिए उस
स्थान पर नारियल
फोड़कर भूमि पूजन
किया। इसके पश्चात्
बारात ने आगे
प्रस्थान किया। वह परंपरा
आज भी कायम
है। आज भी
हम बारात दूसरे
शहर में ले
जाते है तो
बस के टायर
के नीचे नारियल
फोड़ते है। यह
ग्राम देवता और
भूमि पूजन कहलाता
है। लेकिन मंगल
देव फिर भी
प्रसन्न नहीं हुए
और श्रीकृष्ण ने
गणेश जी की
सहायता से मंगल
को प्रसन्न करने
के लिए मांगलिक
वस्तुओं का चलन
प्रारंभ किया। मंगल देव
देवताओं के सेनापति
है और उनका
रंग लाल है।
अतः श्रीकृष्ण ने
मंगल को प्रसन्न
करने के लिए
लाल रंग को
बढ़ावा दिया। बैंड
बाजे वालों की
डेªस का
रंग लाल किया
गया। आज भी
लाल रंग का
समावेश बैड वालों
की ड्रेस में
होता है। फिर
भी मंगल देव
प्रसन्न नहीं हुए।
तब मैनेजमेंट गुरू
श्री कृष्ण ने
प्रथम पूज्य देव
श्री गणेश जी
के साथ मिलकर
मंगल देव को
प्रसन्न करने के
लिए मांगलिक वस्तुओं
का चलन प्रारंभ
किया। यहां पर
आपको बताना चाहूंगा,
कि मंगल देव
का रंग लाल
है और श्रीकृष्ण
ने लाल रंग
को ध्यान में
रखते हुए मांगलिक
कार्यक्रम, यानि विवाह
में लाल वस्तुओं
को शामिल किया
ताकि मंगल देव
प्रसन्न हो सके।
शादि का जोड़ा
(दुल्हन की डेªस) बारात
जब रूकमणी के
घर पहुंची, तब
श्रीकृष्ण ने दुल्हन
की पौशाक यानि
डेªस का
रंग लाल रंग
करवाया। दुल्हन को लाल
जोड़े में सजाया
गया। श्रीकृष्ण द्वारा
दुल्हन की डेªस लाल
रंग करने की
परम्परा आज भी
चल रही है।
श्रीकृष्ण ने एक
बार फिर गणेश
जी का स्मरण
किया और पूछा
अब ठीक है?
गणेश जी ने
कहा नहीं अभी
मंगल संतुष्ट नहीं
है।
लाल सिन्दूर
भगवान श्रीकृष्ण ने मंगल
देव के लाल
रंग सिन्दूर से
दुल्हन की मांग
भरी, लेकिन मंगल
देव प्रसन्न नहीं
हुए। माखनचोर श्रीकृष्ण
ने मंगल को
प्रसन्न करने के
लिए एक ओर
प्रयास किया। प्रयास करने
पर सफलता मिलती
हैं और श्रीकृष्ण
ने भी वहीं
किया।
मंगल के लिए
मंगलसूत्र
श्रीकृष्ण ने श्री
गणेश की सहायता
से मंगल देव
को प्रसन्न करने
के लिए अथक
प्रयास किए, लेकिन
हार नहीं मानी।
सफलता प्रयास करने
से ही मिलती
है। श्रीकृष्ण ने
लाल रंग के
धागे में कस्तुरी
रंगे का लाॅकेट
रूकमणी को गले
में पहनाया। जिसे
हम आज मंगलसूत्र
कहते है। तब
मंगल देव प्रसन्न
हुए। श्रीकृष्ण ने
कहा कि एक
भूमि पूजन नहीं
करने से मंगल
देव इतने रूष्ट
हो गए? इस
पर श्री गणेश
ने कहा कि
मंगल देव देवताओं
के सेनापति है
और इनका वर्ण
लाल है। लेकिन
भूमि पूजन से
ही मंगल देव
प्रसन्न हो गए
थे। शेष सभी
रस्में मैने ही
आपसे पूर्ण करवाई
है, ताकि कलयुग
में मंगली दोष
किसी को हो
तो इन रस्मों
से राहत मिल
सकें। आज भी
में परंपराएं यूं
कि यूं बनी
हुई है। मंगली
दोष न होने
पर भी विवाह
में मंगल वस्तुओं
को होना अनिवार्य
हैं। इस प्रकार
शुरू हुआ विवाह
में मांगलिक वस्तुओं
का चलन।
मंगलनाथ मंदिर में है
मंगल दोष का
उपाय
महाकाल के पास
है, मंगलनाथ का
मंदिर। उज्जैन नगरी शिप्रा
नदी के तट
पर स्थित है।
महाकाल का मंदिर
उज्जैन में है
और मंगलनाथ का
मंदिर भी है।
पूरे भारत से
लोग आकर मंगलनाथ
की पूजा आराधना
करते है, लेकिन
जिनकी कुण्डली में
मंगली दोष होता
है वह लोग
मंगल दोष की
शांति हेतु यहाँ
पर आते है।
यहां पर पूजा
अर्चना करने से
मंगल दोष से
शीघ्र छुटकारा मिल
जाता है। यहां
से कोई निराश
नहीं गया है।
यह मंदिर मंगलेश्वर
भगवान या मंगलनाथ
के नाम से
जाना जाता है।
ऐसा कहा जाता
है कि मंगलनाथ
मंदिर के ठीक
शीर्ष के ऊँपर
ही आकाश में
मंगल ग्रह स्थित
है। मतस्य पुराण
व स्कंद पुराण
सहित अन्य ग्रंथों
में मंगलदेव के
बारे में विस्तार
से वर्णन है।
उज्जैन में ही
मंगलदेव की उत्पत्ति
हुई थी और
जहां पर मंगलनाथ
का मंदिर है
नही उनका जन्म
स्थान है। यह
मंदिर दैवीय गुणों
से भरपूर है।
मंगलदेव की जन्म
कथाः-
भगवान शिव की
एक बार अंधकासुर
नामक दैत्य ने
उपासना की। शिव
जी ने प्रसन्न
होकर वरदान मांगने
के लिए कहा।
अंधकासुर ने वरदान
मांगा कि मेरे
रक्त की बूंदे
जहां पर भी
गिरे वहीं पर
मैं फिर से
जन्म लेता रहूं।
शिवजी ने वरदान
दे दिया। इस
वरदान को पाकर
दैत्य अंधकासुर ने
चारों ओर तबाही
फैला दी। शिवजी
के इसी वरदान
स्वरूप उसे कोई
हरा नहीं सकता।
इस दैत्य के
अत्याचार से परेशान
जनता ने शिव
आराधना की और
कहा कि आप
इस संकट से
छुटकारा दिलाएं। तब शिवजी
और दैत्य अंधकासुर
के मध्य घनघोर
भीषण युद्ध हुआ।
भगवान शिवजी जितनी
बार अपने त्रिशूल
से अंधकासुर को
मारते और उसका
रक्त धरती पर
गिरते ही वह
पुनः जीवित हो
जाता। इस प्रकार
युद्ध लड़ते हुए
शिवजी के पसीने
की बूंदें धरती
पर गिरी, जिससे
धरती दो भागों
में फट गई
और मंगल ग्रह
की उत्पति हुई।
शिवजी के त्रिशूल
के वार से
घायल अंधकासुर का
सारा रक्त इस
नए मंगल ग्रह
में मिल गया
और धरती लाल
हो गई। अंधकासुर
का अन्त हुआ।
शिवजी ने इस
नए ग्रह को
पृथ्वी से अलग
कर ब्राह्मड में
फंेक दिया। यही
कारण है कि
मंगलदोष की शांति
के लिए मंगलनाथ
मंदिर में दर्शन
और पूजा अर्चना
के लिए लोग
आते है। इस
मंदिर में मंगल
देव यानि शिव
स्वरूप हैं।
मंगल भगवान का स्वरूप
नवग्रहों में मंगल
भगवान भूमि और
भ्राता के रूप
में जाने जाते
है। इन्हें भू
पुत्र, अंगारक और खुज
नाम से भी
जाना जाता है।
मंगलदेव को चार
हाथ वाले त्रिशूल
और गदा धारण
किए हुए दर्शाया
गया है। यदि
कुण्डली में मंगल
ग्रह अशुभ स्थिति
में है तो
मंगलनाथ की पूजा
से मंगल ग्रह
की शांति होती
हैं। व्यक्ति ऋण-मुक्त होकर धन
लाभ ¬प्राप्त करता
है। मंगल ग्रह
का रत्न है,
मूँगा। मूँगा धारण करने
पर अशुभ परिणाम
कम हो जाते
है।
किस दिन होती
है विशेष पूजा
?
मंगलनाथ मंदिर में प्रतिवर्ष
मार्च में आने
वाली अंगारक चतुर्थी
को विशेष पूजा
अर्चना होती है।
इस दिन यहां
पर विशेष यज्ञ
हवन किए जाते
है। कहा जाता
है कि इस
दिन पूजा करने
से मंगलदेव तुरंत
ही प्रसन्न हो
जाते है।
भात पूजा द्वारा
शांति
मंगलनाथ मंदिर में भात
पूजा का विशेष
महत्व है। भात
पूजा के माध्यम
से मंगल दोष
दूर किया जाता
है। इस पूजा
की व्यवस्था प्रबंधन
समिति के द्वारा
किया जाता है।
मंगलदोष शीघ्र दूर होता
है।
दामपत्य जीवन में
होने वाली परेशानी
कम होती है।
व्यवसाय में वृद्धि
होती है।
नेतृत्व शक्ति का विकास
होता है।
दूर्घटना में कमी
आती है।
Comments
Post a Comment